सरस्वति वन्दना [1]
हे शारदे सदबुद्धि बल दो
राष्ट्र भक्ति प्रबल दो
शील दो व्यवहार में
और सत्यनिष्ठा अचल दो...
दो सहस्र ईसा से पहले [2]
छोड़ गयी क्यों भारत को?
"नदीतमा" बन वापस आओ
नित्य शुभ्र शुभ स्नान दो...
नील तारा श्री हमें दो
शिव संकल्प महान दो
ज्ञान दो विज्ञान दो
चारित्र्य का उत्थान दो...
रूप दो मातंगिनी
और पाप को अवसान दो
हे स्फटिका भारत को पुन:
गुरुता का अनुपम दान दो...
अब दिव्यता दो वतन को
भारत को नूतन प्राण दो
स्व हृदय में स्थान दो
माँ! यही अभिमान दो...
हे वीणावादिनी सरगम की
लय को सच्चा प्रतिमान दो
हे हंसवाहिनी परमहंस बन जाएँ
हम क्रियमाण दो...
ज्ञान ग्रंथों के जलधि को
प्रखर अभेद्य उफान दो
लुप्त हुई विद्याओं को
अनुभूत अनुसंधान दो...
मंजुलहासिनी हर्ष दो
मन को उमंगित गान दो
हे ब्रह्माणी इन्द्रियों को
वश कर सकूँ यही वरदान दो...
पुन: विश्व गुरु गरिमा पाए
राष्ट्र उच्च सोपान दो
पुन: स्वर्ण-चिड़िया कहलाए
राष्ट्र, गर्व का भान दो...
अंत काल में मातृभूमि हित
मरूं यही सम्मान दो
सिर्फ यही सम्मान दो
माँ बस इतना सम्मान दो...
~ अरुण सिंह क्रान्ति
[1] इस कविता में सरस्वती के नौ स्वरूपों की वन्दना है: शारदा, नदीतमा (सरस्वती नदी), नील तारा, मातंगिनी, स्फटिका, वीणावादिनी, हंसवाहिनी, मंजुलहासिनी, ब्रह्माणी |
[2] सरस्वती नदी, जिनके बारे में कहा जाता है कि लगभग दो सहस्र ईसा-पूर्व वे लुप्त हो गई थी|

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