हे सकल चराचर संचालक,
हे शैलसुता , हे सुखदायक
हे चिर-प्रणम्य, हे पुण्य-परक
हे 'सुराज्य-स्वराज्य' कि
संस्थापक
हे आत्म दीप की उद्दीपक
सम्पूर्ण विश्व की संरक्षक
तव नमन, हे ज्ञान-सुधा
उद्गम
वन्दे! हे मातृभूमि प्रियतम...
हे षड-ऋतु धारिणी, ऋतंभरा
हे हरित, सु-औषध तृप्त धरा
हे अन्नपूर्ण, मधु-दुग्ध प्रदा
हे कृषि-तीर्थ, वन-वसुंधरा
शुचि [1] -सिंचन करें
वृहद् सरिता
है जग-पोषिणी तेरी ममता
तव नमन हे धान्य व धन संगम
वन्दे! हे मातृभूमि प्रियतम...
तव मुकुट बने उत्तुंग शिखर
उन्नत पठार मृण्मय [2]
-सुन्दर
दे
गंग-जमुन की समस्थली
हे स्वर्णक्षेत्र, हे खनिज-खान
झर-निर्झर करते यशोगान
तव नमन हे सुरसुंदरी अनुपम
वन्दे! हे मातृभूमि प्रियतम
हे पूर्ण-पुरातन, सत्य-सनातन
विश्व-शक्ति, शतकोटि-मुखी
"वसुधैव कुटुंब" दिया चिंतन
हे विश्व-नायिका, विश्व-सखी
"एकात्म-भाव" दर्शन-दात्री
"त्यक्तेन भुंजीथा" [6]
व्रत-धात्री
"सर्वे सुखिनः" की ध्येय-पथिक
"अयमात्मा ब्रह्म" वाक्य वैदिक
तव नमन 'आदि-संस्कृति प्रथम'
वन्दे! हे मातृभूमि प्रियतम...
"ईशावास्यमिदं सर्वं" सुधि
"योगस्थः कुरु कर्माणि" विधि
दी चरित्र-शिक्षा जग को हे
माँ तूने दी धर्मराज्य निधि
"सर्व भूतेषु आत्म" क्रिया
फिर
"इदं न मम" का सार दिया
और "चरैवेति" [7]
आधार दिया
हे माँ जग पर उपकार किया
तव नमन हे वैश्विक गुरु परम
वन्दे! हे मातृभूमि प्रियतम...
हे तपोभूमि तव रज चन्दन
इसके तिलक से हो दुःख-भंजन
और मानव-धर्म का ही वंदन
करता तेरा हर सुत-सज्जन
हे शिवि,
दधीची
ऋषि जायी
हे प्रियंवदा, वर शुभ-दायी
तव पर-उपकारी परम्परा
से रत जग में सद्भाव भरा
देती संसार को दृढ संयम
वन्दे! हे मातृभूमि, प्रियतम...
गणितज्ञ हे, शून्य-अनन्त
सृजा
ज्योतिष, खगोल तुझसे उपजा
संसार को दे आरोग्य-दान
वह आयुर्वेद तेरी ही शान
भौतिकी, धात्विकी, रस-विज्ञान
से भरे हैं तेरे श्रुति-पुरान
और सबसे पहला व्योमयान
तूने दिया था माता-महान
हो पुनः आरम्भ वही उपक्रम
वन्दे! हे मातृभूमि, प्रियतम...
माँ, खेल-खेल तेरी ही गोद
जागा प्रताप जागा प्रमोद
तेरे संस्कार से आत्मबोध
है सुलभ अलौकिक शक्ति-शोध
ब्रह्माण्ड शुद्ध करें तेरे यज्ञ
तेरी दीक्षा से विश्व प्रज्ञ
हैं तेरे दूधमुहें शिशु हम
करें तेरा वर्णन, नहीं सक्षम
रह जाए त्रुटि तो क्षमा करना
और सदा प्यार ही माँ! करना,
तव नमन हे प्रेम की सिद्धाश्रम
वन्दे! हे मातृभूमि, प्रियतम...
~ अरुण सिंह क्रान्ति
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